रिश्ता, रिश्ते, रिश्तों का मेला
क्या ये सीमाएँ हैं ?
क्या ये परिधियाँ हैं ?
क्या ये प्रवाह है ?
..या ये गलबहियाँ हैं
या ये पक्के पुल हैं
मुझ से चल कर
उस तक और उन तक
प्यार की बहती नदी पर बना
अहसासों के अलिखित अनुबन्ध
वो आता है
इस पर चल कर
मैं जाता हूँ
इस पर चल कर
रामनारायण सोनी
१४.९.२५
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