आज के लिये है
आज एक कविता
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यह आज वह है
जिसके लिये कल कल्पना की थी
वह कल, जो उस दिन आज था
वह था इस आज ही की तरह
वह कल जिसे आसानी से ही
लोग दिवंगत समझ लेते हैं
मेरे लिये वह कल, हाँ वही कल
आज की आधारशिला गढ़ा
तभी आज का यह प्राचीर,
उस कल की नींव पर खड़ा
अजीब बात कही किसी ने
कि "बीत गई वह बात गई"
पर उसने मेरे इस जीवन की
फिर से चादर बुनी नई
कल की वे सारी प्रसव पीर
है आज प्रसव प्रसून बनी
किलकारी गूँजी नई नई
गिरते पतझड़ के पातों ने
सौंपी कलिकाएँ नई नई
जो जो ध्वंस हुआ कल था
वह आज सृजन ले कर आया
वह बीता कल जो बीत गया
फिर चोला नया पहन आया
यह आज नया सा लगता है
यह भी तो कल में बदलेगा
श्रम जल से सिंचन कर लें
जीवन में जीवन भर लेगा
और यह नया दिन, नव विहान !
कैसा हो ?
एक नया दिन फिर होगा!
जरा व्याधियाँ सब विखंडित होंगी,
अपने स्कन्धों में फिर पौरुष दौड़ेगा।
उत्साह के अश्वों की हिनाहिनाहट से
उपत्यकाएँ गूँज उठेंगी।
प्रखर प्रज्ञा की स्रोतस्विनियाँ
मनस्वियों के हृदयों से उत्सर्जित होंगी,
जो अर्चियों के प्रकम्प से
ब्रह्मनाद का उद्घोष करेंगी।
फिर से एक दिन नया होगा!
उदय होगा भास्कर भुवन में
नूतन नवविहान ले कर
उपासना जन्य सिद्धियों
और कर्मजा समृद्धियों का
दिशा दिशा में प्रतिवर्षण होगा।
पुरुषार्थ की अग्नि शलाकाएँ प्रतिरोधों को
विदीर्ण कर देने वाली शक्तियाँ स्फूर्त होंगी।
रामनारायण सोनी
# कवितालय
१.१.२६
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